इमरोज:एक दुनिया प्यार की

Posted: Thursday, April 8, 2010 by Bhawna 'SATHI' in लेबल: ,
6

"तुझ में शामिल होकर ही,
लम्हा-लम्हा जीता हूँ जिन्दगी "
इमरोज जी से मिलना हुआ,कुछ दिनों पहलेपर आज भी सब वैसा ही टटका और ताजा है पहले से कोई परिचय नही था,लेकिन मिलने के लिए समय इस तरह से दे दिया कि लगा कोई पुरानी परिचिता हूँ जो जब चाहे तब आ जायेमन को भा गयी थी इतनी आत्मीयता और सहजतागर्मी थी,घर खोजते-खोजते पहुची,नीचे ही मुलाकात हो गयी दरवाजे के अंदर ही जाते ही मुझे लगा कि ये अलग दुनिया है इस तथाकथित दुनिया की असुन्दरता से अलग सब कुछ सुंदर-सुंदर सा उस घर में जाकर आँखे फाडकर -फाडकर सब देखते हुए कुछ ऐसा महसूस हो रहा था जो शायद शब्दों की सीमा से बाहर थापूरा घर प्रेम में डूबा-डूबा, भींगा -भींगा सा लगा सब कुछ प्रेममय
अपने ही कमरे में बिठाया उन्होंने और अमृता जी को जीने लगे हम दोनोंढेर सारी कविताये और बाते चाय के साथ पीते हुएदोपहर का खाना भी अपने साथ बैठा कर प्यार से खिलाया फिर बातो में डूबे तो शाम होने लगीपूछा,चाय बना लेती हो और किचन में ले गये,खुद दो चार बर्तनों को साफ करने लगे और मैं उस किचन में अमृता को महसूस करके चाय बनाती रहीदेखती रही उस 'आदमी ' के अंदर की औरत को जिसने अमृता को सखी बना कर जीया और औरत- मर्द के रिश्ते को एक नया मुकाम दे दिया इतनी गहराई और इतनी पवित्रता का सम्बन्ध सोच के परे भी है लोगो के
मंदिर बहुत कम जाती हूँ पर उस दिन लगा "प्रेम मंदिर "में बैठी हूँ सचमुच इमरोज जी अमृता जी को अपने अंदर और बाहर जिन्दा किये हुए है चलते वक्त अपनी नज्मो की किताब पर प्यार की सीख भी दे डाली "Everything you Love is your's"पहली बार प्यार को अपनी पूरी सजीवता में देखा और महसूसा था और ये चंद घंटो की मुलाकात नक्श हो गयी जिन्दगी पर

6 टिप्पणियाँ:

  1. mukti says:

    वाह !!! अच्छा लगा ये संस्मरण. कब मिलीं तुम इमरोज़ से?

  1. जिस छत के नीचे अमृता जी ने ज़िन्दगी गुजारी...जिस जमीन पर चलीं...वह तो प्रेम मंदिर सा पवित्र होना ही था...
    इमरोज़ जी की यही सहजता तो सबको उनकी तरफ यूँ खींच लेती है... बहुत ही बढ़िया संस्मरण

  1. अच्छा लगा जानकर आपकी मुलाकात के विषय मे.

  1. वाह, तो आपने अमृता जी के किचन की ज़िन्दगी भी जी ली... वाह, क्या किस्मत!!

  1. SMRITI JO JAKAR BHI NA JAYE.............